अगर हो सके तो कभी लौट आना वापिस उसी घर में ,
जिसकी दीवारों पर बिखरी पड़ी हैं तुम्हारी अनगिनत यादें।
जिसके फर्श पर पड़े तुम्हारे पाँव के निशान,
पोंछे नहीं हैं अब तक किसी ने ।
आज भी जिसकी छत की मुंडेरें सर उठाये
तुम्हारी राह तकती हैं।
ज्यादा हमको मत
, कभी हो सके तो लौट आना।
बहुत कठिन है सूरज बनना ,
ऊँचे उठकर रोशन होकर साड़ी दुनिया के लिए जलना ।
नहीं बन सको ऐसा न सही , पर कोशिश करना
की बन सको एक नन्हा सा दिया ।
छोटी सी उम्र लेकर जो बस एक रात जिया,
दामन को अपने जलाकर भी देना किसी रात को एक रोशन सवेरा ।
दुनिया का न सही दूर करना एक ही दिल का उदास अँधेरा,
बुझते दिए से नयी लौ जलना , अगर हो सके तो लौट आना।
No comments:
Post a Comment