Thursday, April 15, 2010


अगर हो सके तो कभी लौट आना वापिस उसी घर में ,

जिसकी दीवारों पर बिखरी पड़ी हैं तुम्हारी अनगिनत यादें।

जिसके फर्श पर पड़े तुम्हारे पाँव के निशान,

पोंछे नहीं हैं अब तक किसी ने ।

आज भी जिसकी छत की मुंडेरें सर उठाये

तुम्हारी राह तकती हैं।

ज्यादा हमको मत

, कभी हो सके तो लौट आना।

बहुत कठिन है सूरज बनना ,

ऊँचे उठकर रोशन होकर साड़ी दुनिया के लिए जलना ।

नहीं बन सको ऐसा न सही , पर कोशिश करना

की बन सको एक नन्हा सा दिया ।

छोटी सी उम्र लेकर जो बस एक रात जिया,

दामन को अपने जलाकर भी देना किसी रात को एक रोशन सवेरा ।

दुनिया का न सही दूर करना एक ही दिल का उदास अँधेरा,

बुझते दिए से नयी लौ जलना , अगर हो सके तो लौट आना।

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